गुरुवार, १२ जानेवारी, २०१७

सीखके आये है जिनसे बेरुखी हम
उनकोही शिकवा है अब तनहाइयोसे..
भीडमें उस ढुंढते ही रह गये सब,
शख्स वो जो जी रहा गहराइयोंसे....
रूठने वाले भी हम और हमही मुजरीम
क्या कहे अपनी ही इन परछाइयोंसे..
दो घड़ी के साथ की तो बात थी पर
घिर गये हम फिर उन्ही विरानियोंसे..

1 टिप्पणी: